बुद्ध जयंती के पावन अवसर पर जानकारी…….
*** सी जी प्रतिमान न्यूज ***
** तथागत गौतम बुद्ध के गृह त्याग कर प्रवाज्या हेतु ज्ञान प्राप्ति हेतु ,जाने/प्रस्थान की सही वजह **
-----------------
कोसल जनपत के अधीन शाक्य राज्य रहा है जिसके प्रधान/शासक शुद्धोधन रहे है जिनका पुत्र सिद्धार्थ गौतम हुए। शाक्य लोगो का संघ था ,जिसमे बीस वर्ष आयु होने पर शाक्य को संघ का सदस्य बनना होता था, बीस साल की आयु होने पर गौतम भी संघ के सदस्य बने और संघ के हित संबंधी नियमों आदि को जान कर सदस्य जिम्मेदारी निभाने लगे ।
संघ के सदस्य बने गौतम को आठ साल हो गए तब रोहणी नदी के जल को लेकर शाक्य और कोलियो में विवाद हो गया। शाक्य संघ सेनापति ने सभा बुलाकर युद्ध करने की बात कही, इसे गौतम ने मना किया और बातचीत से हल करने का सुझाव दिया, जो अमान्य हो गया। फिर युद्ध के लिए सेना में भरती होने की बात को भी गौतम ने इंकार कर दिया। गौतम के इस व्यवहार को संघ हित के विरोध में मानकर गौतम को संघ नियम के अंतर्गत दंड दिया गया , जिसमे से गौतम ने देश निकाला/देश से बाहर जाने के दंड को स्वीकारा। संघ सेनापति को आशंका हुई की कोसल नरेश समझ जाएंगे कि गौतम ने युद्ध करने से मना किया इसलिए देश निकाला हुआ जिससे कोसल नरेश शाक्य से नाराज़ हो जाएंगे, तब इस दुविधा का निराकरण भी गौतम ने दिया की वह पेरिव्रजक बन जाता है जो देश निकाला जैसा ही है। परिव्रजक के लिए माता, पिता और पत्नी की अनुमति चाहिए रहती है, फिर गौतम ने उन सभी से अनुमति लेकर गृह त्याग किया था। *उक्त बाते बाबा साहेब अंबेडकर जी की पुस्तक= बुद्ध और उनका धम्म= में उल्लेखित है।*
गौतम बुद्ध के गृह त्याग का कारण मृत , बीमार, बूढ़े शरीर को देखना उचित नहीं दिखाता बल्कि एक विवाद से जो शाक्य संघ से विरोध हुआ, उसके कारण गृह त्याग हुआ। गौतम संघ का लंबे समय से सदस्य रहा वहा लोगो से लगातार मेलजोल में रहा, जहां संगत में रहकर गौतम पहले ही जान गया होगा की मृत्यु, बीमारी, बुढ़ापे की अवस्था क्या होती है।
असल में बुद्ध चरितम आदि संस्कृत में लिखे साहित्य में मृत, वृद्ध, बीमार को गौतम द्वारा देखे जाने का बताया लेकिन संघ विवाद की बात नही बताई गई।
बाद में युद्ध की इस्थिति नही रही तब भी गौतम वापस नहीं आए , उन्होंने विचार किया युद्ध की समस्या अनिवार्य तौर पर विरोध की समस्या है , इस तरह का विरोध /संघर्ष सभी लोगो में, गृहस्थ में, माता पिता पुत्र के बीच में, वर्गो के बीच में स्थाई होकर लगातार जारी है । संसार के कष्टों और दुख के मूल में यह वर्ग संघर्ष ही है । इसलिए मुझे उस सामाजिक संघर्ष की समस्या का हल खोज निकालना है, यह गौतम ने विचार किया । इसलिए गौतम ने उसके लिए हर परंपरा का, हर मत का, स्वयं परीक्षण करने का निश्चय किया ।
बाबा साहेब अंबेडकर जी की पुस्तक = बुद्ध और उनका धम्म= के तीसरे भाग में , नए प्रकाश की खोज में वाले चेप्टर में विभिन्न मत, परंपरा का अध्ययन/परीक्षण गौतम द्वारा किए जाने का उल्लेख आया है, उक्त पुस्तक के चौथे भाग में , नवीन मार्ग का दर्शन और ज्ञान लाभ गौतम द्वारा प्राप्त करने का उल्लेख है, जिसमे यह भी बताया है की सम्यक संबोधी प्राप्त करके गौतम बोधिसत्व होकर सम्यक संबद्ध हो गए । * पुस्तक के उक्त अध्याय/चेप्टर का अवलोकन/अध्ययन पाठकगण अवश्य करे …….
.
नमो बुद्ध ,बुद्ध जयंती की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ