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Homeधर्मगुरु घासीदास जयंती के अवसर पर विशेष ध्यानाकर्षण : "भारत का संविधान"...

गुरु घासीदास जयंती के अवसर पर विशेष ध्यानाकर्षण : “भारत का संविधान” की ओर……. सुनील भारद्वाज की कलम से

सुनील भारद्वाज

भारत के संविधान में निहित महापुरुषों के सिद्धांत – श्रृंखला – 1

सीजी प्रतिमान न्यूज़ 18 दिसंबर / बाबा गुरु घासीदास जी का जन्म सन 1756 ई. में बलौदाबाजार जिले के गिरौदपुर नामक गांव में हुआ था। तब छत्तीसगढ़ सेंट्रल प्रोविंस का भाग था। उन्होंने अपने समय की सामाजिक आर्थिक विषमता, शोषण तथा जातिवाद को समाप्त करके मानव-मानव एक समान का संदेश दिये। इनसे समाज के लोग बहुत ही प्रभावित रहे हैं। सतनामी साध मत के अनुयायी रहे हैं (जिनका संबंध हरियाणा के नारनौल से है) जो किसी भी मनुष्य के सामने नहीं झुकने के सिद्धांत को मानते थे। वे सम्मान करते थे लेकिन किसी के सामने झुक कर नहीं। ऐसे परिस्थिति में छत्तीसगढ़ में व्याप्त मूर्ति पूजा उनको अच्छा नहीं लगा और उन्होंने मूर्तियों के सामने झुकना अपने स्वाभिमान के खिलाफ समझा बाबा गुरु घासीदास इसे अंधभक्ति, पाखंड और अवैज्ञानिक मानते थे। वे इसे एक सामाजिक बुराई के रूप में भी देखते थे। उन्होंने ऐसे सामाजिक कुरीतियों पर कुठाराघात किया। जिसका असर आज तक दिखाई पड रहा है। गुरू घासीदास जातियों में भेदभाव व समाज में भाईचारे के अभाव को देखकर बहुत दुखी थे। वे लगातार प्रयास करते रहे कि समाज को इससे मुक्ति दिलाई जाए। लेकिन उन्हें इसका कोई हल दिखाई नहीं देता था। वे समाधान (सत्य) की तलाश के लिए गिरौदपुरी के जंगल में छाता पहाड पर समाधि लगाये तथा सोनाखान के जंगलों में सत्य और ज्ञान की खोज के लिए लम्बी अज्ञातवास (तपस्या) भी की।
इस अज्ञातवास में बाबा गुरु घासीदास जी ने जिन सामाजिक कुरीतियों पर चिंतन मनन किया उसके समाधान के लिए सात सिद्धांत दिए। जिसका वर्णन उस पर के एक अंग्रेज लेखक ने अपने एक लेख में किया है जिसे पढ़कर बाबा साहब डॉ भीमराव अम्बेडकर ने कहा कि बाबा गुरु घासीदास जी एक महान क्रांतिकारी परिवर्तन के पक्षधर नेतृत्वकर्ता थे। जब डॉ अंबेडकर को भारत का संविधान लिखने का अवसर मिला तो वे इस महापुरुष (गुरु घासीदास जी) के संदेशों को संविधान में समाहित करने से नहीं चूके जो इस प्रकार हैं :–

बाबा गुरु घासीदास जी के प्रथम संदेश “मूर्ति पूजा बंद करो” से प्रेरित भारत के संविधान का अनुच्छेद 51क(ज) जिसमें कहा गया है कि – देश के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह – वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे।

बाबा गुरु घासीदास जी का दूसरा संदेश “सत मार्ग पर चलो, सत कर्म करो और सत आचरण करो” के पालन में आने वाली समस्त बाधाओं को दूर करता है भारत के संविधान का अनुच्छेद 13 के खण्ड (1) में कहा गया है कि – इस संविधान के लागू होने के पहले से प्रवृत्त रीति-रिवाज, प्रथा-परंपरा, विधि-विधान, कानून-कायदा, रूढ़ी और अंधविश्वास को शून्य कर दिया गया है और खण्ड (2) में यह भी कहा गया है कि – आगे ऐसा कोई नियम बनाए भी नहीं जाएंगे जो किसी भी हद तक मानवीय मूल्यों को कम करती हो।

बाबा गुरु घासीदास जी का तीसरा संदेश “मनखे-मनखे एक बरोबर” भारत के संविधान का अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समता, अनुच्छेद 15: जाति, धर्म, लिंग, जन्म स्थान तथा मूलवंश के भेद भाव किए बगैर समानता, अनुच्छेद 326: मताधिकार में समानता ।

बाबा गुरु घासीदास जी का चौथा संदेश “नशा न करना.” इसका सीधा संबंध मद्यपान निषेध से है जो कि भारत का संविधान के अनुच्छेद 47 में वर्णित है जिसमें कहा गया है कि – स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मादक पदार्थों का औषधीय प्रयोजन से भिन्न प्रयोग नहीं किया जाएगा।

बाबा गुरु घासीदास जी का पांचवा संदेश “मांसाहार ना करना, जीव हत्या न करना, दोपहर में हल न चलाना.” बाबाजी के इस संदेश में प्राणी मात्र के प्रति दया भाव दिखाई देता है जो कि भारत का संविधान के अनुच्छेद 51क(छ) और 48 में वर्णित है ।

बाबा गुरु घासीदास जी का छठवां संदेश “किसी भी व्यक्ति से छुआ-छूत करना जघन्य अपराध है.” इस बात को सीधे तौर पर बाबा साहब डॉ भीमराव अम्बेडकर ने अपने जीवन में महसूस किया और इसका निवारण लिखा है भारत का संविधान के अनुच्छेद 17 में जिसमें कहा गया है कि – “अस्पृश्यता” का अंत किया जाता है और उसका किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध किया जाता है। ”अस्पृश्यता” से उपजी किसी निर्योग्यता को लागू करना अपराध होगा जो विधि के अनुसार दंडनीय होगा।

बाबा गुरु घासीदास जी का सातवां संदेश “व्यभिचार न करना” के अर्थ में है – पर नारी को माता समान समझो, विधवा विवाह को प्रोत्साहित करो, अपने घर के नारी को शिक्षित करो. समाहित है। बाबाजी का यह संदेश भारत का संविधान के अनुच्छेद 15, 21क, 42, 39 और 51क(ङ),(ट) में वर्णित है।
👉 इसके अलावा “चोरी न करना”, “जुआ न खेलना” इन दोनों का संबंध आर्थिक प्रवृत्ति से है, इसका आधार आर्थिक गतिविधियां है, आर्थिक विपन्नता के कारण लोग चोरी करते हैं और जुआ खेलने से आर्थिक विपन्नता आती है। आर्थिक विपन्नता को दूर करने का उपाय “भारत का संविधान” के अनुच्छेद 39 और 38(2) में किया गया है।

“झूठ न बोलना”, “बुरी संगत में न रहना” जैसे अन्य संदेश भी हैं जिसका संदर्भ आप प्रबुद्ध जन “भारत का संविधान” में स्वयं खोज सकते हैं।

✍️ संकलनकर्ता
सुनील भारद्वाज
7000150900
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