
खौफ मेरे आस्तां उठता रहा..…..
सच्चाइयों का दम वहां घुटता रहा
इक खौफ मेरे आस्तां उठता रहा
चिंगारियां सब बेअसर साबित हुईं
आग ना भड़की धुंआ उठता रहा
हम जहां पहुंचे वहां जाना न था
रहबर चला जिस रास्ता चलता रहा
वो हमारा हो नहीं सकता कभी
ज़हर ऐसे हमारे दरम्यां घुलता रहा
गुल को कहां ऐतराज कांटों से भला
वो बेरहम था बागवां चुभता रहा
झुक गया मुफ़लिस तो इतना शोर क्यों
ख़ामोश थे जब आसमां झुकता रहा
हम न ऐसे नफ़रती थे ‘रूसिया’
ये दिल ही था जो खामखां दुखता रहा

---राकेश गुप्ता, रूसिया
दुर्ग छत्तीसगढ़








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